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अमेरिका और रूस के बीच मौजूद ग्रीनलैंड अब धीरे-धीरे बहुत अहम इलाका बनता जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है दुनिया का गर्म होना और आर्कटिक में बर्फ का पिघलना। जब बर्फ कम हो रही है, तो वहां नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं और जमीन के नीचे छिपे संसाधन भी सामने आ रहे हैं। इसी वजह से ग्रीनलैंड अब सेना, कारोबार और प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है। द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीनलैंड दुर्लभ खनिजों के मामले में दुनिया में आठवें स्थान पर है और यहां लगभग 15 लाख टन खनिज भंडार होने का अनुमान है। ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में भी ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा जताई थी। तब इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। इसे सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी या दिखावा मानकर नजरअंदाज कर दिया था। लेकिन अब हालात काफी बदल चुके हैं। ट्रम्प अब इसपर कब्जा करने की धमकी दे रहे हैं। अब इसे गंभीर चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। आर्कटिक में बन रहे दुनिया के नए व्यापारिक रास्ते आर्कटिक वह इलाका है, जहां दुनिया की कई बड़ी ताकतें एक-दूसरे के बहुत करीब आ जाती हैं। यहां रूस, कनाडा, अमेरिका और ग्रीनलैंड लगभग आमने-सामने हैं। इसी वजह से इस इलाके को लेकर देशों के बीच मुकाबला बढ़ता जा रहा है। इस प्रतिस्पर्धा की तीन बड़ी वजहें हैं- 1. तेल, गैस और दुर्लभ खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों की बढ़ती जरूरत 2. दुनिया भर में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव, जहां हर देश अपनी ताकत दिखाना चाहता है 3. सबसे अहम वजह है जलवायु परिवर्तन दुनिया के गर्म होने से आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है। जो इलाका पहले बर्फ की वजह से छिपा रहता था, वह अब धीरे-धीरे खुलने लगा है। ऐसा लग रहा है जैसे दुनिया के नक्शे पर एक नया इलाका अचानक उभर आया हो। इसी नए मौके पर कब्जा जमाने के लिए देशों के बीच होड़ मची हुई है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्रीनलैंड की अहमियत बढ़ी ग्लोबल वार्मिंग की वजह से आर्कटिक में अब नए समुद्री रास्ते बन रहे हैं, जिनका इस्तेमाल व्यापारिक जहाज कर सकते हैं। ये रास्ते एशिया, यूरोप और अमेरिका के बीच सफर को छोटा और सस्ता बना सकते हैं, इसलिए बड़ी ताकतों की नजर अब इन पर है। सिर्फ समुद्री रास्ते ही नहीं, बर्फ के नीचे दबे कीमती प्राकृतिक संसाधन भी अब दिखने लगे हैं। माना जाता है कि ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र में तेल, गैस, दुर्लभ खनिज और दूसरी अहम धातुओं का बड़ा भंडार मौजूद है। जैसे-जैसे बर्फ पिघल रही है, इन संसाधनों को निकालना आसान होता जा रहा है। यही वजह है कि अमेरिका, रूस और दूसरी बड़ी ताकतें इस इलाके में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। इन सभी कारणों से ग्रीनलैंड अब सिर्फ बर्फ से ढका एक दूरदराज इलाका नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे वैश्विक राजनीति का अहम केंद्र बनता जा रहा है, जहां भविष्य में देशों के बीच टकराव और प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। ग्रीनलैंड अकेले ही फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, इटली और जर्मनी जैसे देशों को मिलाकर भी उनसे बड़ा है। अगर ट्रम्प कभी ग्रीनलैंड को अमेरिका के कब्जे में ले आते हैं, तो यह अमेरिका के इतिहास का सबसे बड़ा इलाका होगा। यह अलास्का और कैलिफोर्निया जैसे बड़े राज्यों से भी बड़ा होगा। यही वजह है कि ग्रीनलैंड और पूरा आर्कटिक इलाका आज दुनिया की राजनीति में इतना अहम बन गया है। आर्कटिक इलाके में लीबिया से बड़े इलाके की बर्फ पिघली पिछले पांच सालों में आर्कटिक क्षेत्र में समुद्री बर्फ का औसत क्षेत्रफल 46 लाख वर्ग किलोमीटर रह गया है। यह 1981 से 2010 के औसत के मुकाबले 27% कम है। जितनी बर्फ पिघल चुकी है, उसका क्षेत्रफल लगभग अफ्रीकी देश लीबिया जितना है। बर्फ पिघलने की वजह से अब आर्कटिक क्षेत्र में समुद्र लंबे समय तक खुला रहने लगा है। पहले यहां इतनी मोटी बर्फ जमी रहती थी कि आम जहाजों का गुजरना नामुमकिन था। उस समय सिर्फ खास आइस ब्रेकर जहाज ही इन इलाकों में जा पाते थे। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं और आम व्यापारिक जहाज भी इन रास्तों का इस्तेमाल करने लगे हैं। इन नए समुद्री रास्तों में सबसे अहम नॉर्दर्न सी रूट (उत्तरी समुद्री मार्ग) है। यह रास्ता रूस के आर्कटिक तट के साथ-साथ चलता हुआ यूरोप को एशिया से जोड़ता है। इस रास्ते से जहाजों का सफर काफी छोटा हो जाता है, जिससे समय और ईंधन दोनों की बचत होती है। इसी वजह से यह मार्ग तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। रूस के लिए नॉर्दर्न सी रूट सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं है, बल्कि उसकी लंबी रणनीति का अहम हिस्सा है। रूस इस मार्ग के जरिए व्यापार बढ़ाना चाहता है और आर्कटिक में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। यही कारण है कि वह इस रास्ते पर बंदरगाह, ढांचे और सैन्य मौजूदगी बढ़ाने पर जोर दे रहा है। बर्फ के पिघलने से खुले ये समुद्री रास्ते अब आर्कटिक को दुनिया की बड़ी ताकतों के लिए पहले से कहीं ज्यादा अहम बना रहे हैं। इसके अलावा कनाडा के आर्कटिक द्वीपों के बीच से गुजरने वाला नॉर्थ-वेस्ट पैसेज (उत्तर-पश्चिमी मार्ग) और उत्तरी ध्रुव के ऊपर से जाने वाला सेंट्रल आर्कटिक रूट भी भविष्य में अहम माने जा रहे हैं। इन रास्तों से यूरोप से एशिया की यात्रा का समय काफी कम हो सकता है और ये स्वेज नहर के विकल्प बन सकते हैं। आर्कटिक इलाके में अमेरिका, रूस, चीन सभी का दावा साल 2025 में ‘इस्तांबुल ब्रिज’ नाम का एक कंटेनर जहाज चीन से ब्रिटेन तक नॉर्दर्न सी रूट से सिर्फ करीब 20 दिनों में पहुंच गया। आम तौर पर दूसरे रास्तों से यही सफर ज्यादा समय लेता है। इसी तरह 2024 में रूस और अमेरिका के बीच मौजूद बेरिंग स्ट्रेट से 665 जहाज गुजरे। यह संख्या 2010 के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। यानी पिछले कुछ सालों में जहाजों की आवाजाही तेजी से बढ़ी है। हालांकि खतरे अभी भी खत्म नहीं हुए हैं। कई बार गर्मियों में भी बर्फ अचानक जम जाती है और जहाज उसमें फंस जाते हैं। इसलिए ये रास्ते फायदेमंद तो हैं, लेकिन पूरी तरह सुरक्षित अभी नहीं हैं। आर्कटिक इलाके को लेकर देशों के बीच तनाव भी बढ़ रहा है। कनाडा, डेनमार्क, नॉर्वे, रूस और अमेरिका सभी इस क्षेत्र पर अपने दावे रखते हैं। वजह साफ है कि यहां नए समुद्री रास्ते हैं और भविष्य में बड़े संसाधन मिलने की उम्मीद है। अमेरिका की ग्रीनलैंड में पहले से सैन्य मौजूदगी है, जहां एक सैन्य अड्डा मिसाइल वॉर्निंग और स्पेस सर्विलांस का काम करता है। रूस ने भी पिछले दस सालों में कई सैन्य ठिकाने खोले हैं और पुराने सोवियत दौर के अड्डों को फिर से सक्रिय किया है। 2018 में चीन ने खुद को 'नियर आर्कटिक कंट्री' बताया ताकि इस इलाके में अपना रोल बढ़ा सके। एक्सपर्ट्स के मुताबिक पिछले 10 से 15 सालों में आर्कटिक में मिलिट्री गतिविधियां काफी बढ़ी हैं। 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद हालात और बदल गए हैं। अब आर्कटिक सिर्फ बर्फ और ठंड का इलाका नहीं रहा, बल्कि दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच मुकाबले और रणनीति का नया मैदान बनता जा रहा है। ग्रीनलैंड से घटती बर्फ ने बढ़ाई दुनिया की दिलचस्पी फिनलैंड और स्वीडन के नाटो में शामिल होने से सुरक्षा स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। इससे रूस की कोशिशें और तेज हुई हैं कि वह कोला आइलैंड और बैरेंट्स इलाके जैसे क्षेत्रों पर अपना कंट्रोल बनाए रखे। यूक्रेन युद्ध के बावजूद रूस ने आर्कटिक में अपनी मौजूदगी बनाए रखी है। फिनलैंड और स्वीडन के NATO में शामिल होने से आर्कटिक इलाके की सुरक्षा स्थिति काफी बदल गई है। पहले ये दोनों देश NATO से बाहर थे, लेकिन अब उनके जुड़ने से NATO सीधे रूस की उत्तरी सीमा के और करीब पहुंच गया है। इससे रूस की चिंता बढ़ गई है। इसी वजह से रूस अपनी कोशिशें तेज कर रहा है कि वह कोला प्रायद्वीप और बैरेंट्स सागर जैसे इलाकों पर अपना मजबूत नियंत्रण बनाए रखे। ये क्षेत्र रूस के लिए बहुत अहम हैं, क्योंकि यहां उसकी नौसेना और परमाणु क्षमता से जुड़े ठिकाने मौजूद हैं। यूक्रेन युद्ध में उलझे होने के बावजूद रूस ने आर्कटिक में अपनी सैन्य मौजूदगी कमजोर नहीं होने दी है। दूसरी तरफ NATO देश भी पीछे नहीं हैं। वे आर्कटिक में अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ा रहे हैं और खास तौर पर नए आइसब्रेकर जहाज बनाने की घोषणाएं की जा रही हैं, ताकि बर्फीले समुद्रों में उनकी पहुंच बनी रहे। NATO के विस्तार के बाद डेनमार्क की वायुसेना अब नॉर्वे, फिनलैंड और स्वीडन के साथ पहले से ज्यादा मिलकर सैन्य अभ्यास और निगरानी कर रही है। इस इलाके में चीन की दिलचस्पी भी बढ़ रही है। साल 2024 में चीन ने अपने तीन आइसब्रेकर जहाज आर्कटिक भेजे। ग्रीनलैंड क्यों रणनीतिक रूप से अहम है ग्रीनलैंड को जानिए ग्रीनलैंड में 57 हजार लोग रहते हैं, यह डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है। ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा आइलैंड है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 21 लाख वर्ग किमी है। ग्रीनलैंड का 85% भाग 1.9 मील (3 किमी) मोटी बर्फ की चादर से ढका है। इसमें दुनिया का 10% ताजा पानी है। यह उत्तर अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच में है। ग्रीनलैंड जलवायु परिवर्तन के संकट से जूझ रहा है। ग्रीनलैंड में नियोडायनियम, प्रासियोडायमियम, डिस्प्रोसियम, टर्बियम और यूरेनियम जैसे कई दुर्लभ खनिजों का भंडार है। यह खनिज इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रोडक्शन में काफी अहम रोल रखते हैं। इसके अलावा दुनिया में लगातार बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्रीनलैंड और आर्कटिक महाद्वीप की बर्फ तेजी से पिघल रही है। ऐसे में इस जगह का सामरिक और आर्थिक महत्व तेजी से बढ़ रहा है। यहां खनन का काम कर रही कंपनियों में चीन की भी बड़ी हिस्सेदारी है। यह पहली बार नहीं है जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने ग्रीनलैंड खरीदने की इच्छा जताई हो। इससे पहले 1946 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने डेनमार्क से 10 करोड़ डॉलर में इस बर्फीले द्वीप को खरीदने पेशकश दी थी। ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में अमेरिकी वायुसेना का अड्डा है, जहां करीब 600 सैनिक तैनात हैं। ग्रीनलैंड भारत के लिए क्यों जरूरी है आर्कटिक क्षेत्र में स्थित ग्रीनलैंड, भारत के लिए इसलिए अहम है क्योंकि आर्कटिक में हो रहे जलवायु बदलावों का सीधा असर भारतीय मानसून और हिमालयी ग्लेशियरों पर पड़ता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक आर्कटिक दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में लगभग चार गुना तेजी से गर्म हो रहा है। ग्रीनलैंड की विशाल बर्फीली चादर पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ता है और इसका असर भारत के तटीय इलाकों और मौसम के पैटर्न पर भी पड़ सकता है। दूसरा बड़ा कारण विज्ञान और रिसर्च है। भारत 2007 से आर्कटिक में वैज्ञानिक शोध कर रहा है और नॉर्वे के स्वालबार्ड क्षेत्र में भारत का ‘हिमाद्री’ रिसर्च स्टेशन काम कर रहा है। ग्रीनलैंड और आसपास के आर्कटिक क्षेत्रों से मिलने वाला डेटा भारतीय वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करता है कि आर्कटिक में बर्फ पिघलने का असर हिमालय और भारत की नदियों पर कैसे पड़ेगा, जिन पर देश की बड़ी आबादी निर्भर है। ग्रीनलैंड रणनीतिक और आर्थिक रूप से भी भारत के लिए अहम है। आर्कटिक में बर्फ कम होने से नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जो यूरोप और एशिया के बीच सफर का समय काफी घटा सकते हैं। इसके अलावा ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज मोबाइल, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और आधुनिक तकनीक के लिए जरूरी हैं। भारत अपनी आर्कटिक नीति के तहत इन संसाधनों में टिकाऊ और नियमों के मुताबिक सहयोग और निवेश के मौके तलाश रहा है। -------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले- गोल्डन डोम प्रोजेक्ट के लिए ग्रीनलैंड की जरूरत: कुछ न कुछ हल निकालेंगे; ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री बोली- अमेरिका का गुलाम नहीं बनना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार को फिर से ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की अपनी इच्छा दोहराई है। उन्होंने कहा कि कुछ न कुछ हल निकल आएगा। ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को गोल्डन डोम नामक बड़े रक्षा प्रोजेक्ट के लिए बहुत महत्वपूर्ण बताया है। पूरी खबर पढ़ें…